"لقد أحبّتْ شاعرا"
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وتمضغُ النساءُ في المدينة القديمَهْ..
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قِصّتنا العظيمَهْ..
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ويرفعُ الرجالُ في الهواءْ
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قَبَضاتِهم.. وتُشْحَذُ الفؤوسْ..
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وتُقْرع الكؤوسُ بالكؤوسْ..
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كأنها .. كأنها جريمَهْ..
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بأن تحبّي شاعرا...
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فَرَاشي..
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يا ليتَ باستطاعتي
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أن لا أكونَ شاعرا..
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يا ليتني..
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أقدرُ أن أكونَ شيئاً آخرا
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مرابياً، أو سارقاً..
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أو قاتلاً..
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أو تاجراً..
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يا ليتني أكونُ يا صديقتي الحزينهْ..
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لصّاً على سفينَهْ..
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فربّما تقبلُني المدينَهْ..
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مدينةُ القصديرِ والصفيحِ، والحجَرْ.
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تلكَ التي سماؤها لا تعرفُ المطرْ..
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وخبزُها اليوميّ..
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حقدٌ وضجَرْ..
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تلكَ التي .. تطاردُ الحرفَ..
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وتغتالُ القمَرْ..
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يا ليتَ باستطاعتي..
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يا نجمتي،
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يا كرمتي،
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يا غابتي،
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أن لا أكون شاعرا..
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لكنما الشعرُ قدَرْ..
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فكيفَ، يا لؤلؤتي وراحتي..
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أهربُ من ها القدَرْ؟.
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*
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الناسُ في بلادنا السعيدَهْ..
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لا يفهمونَ الشاعرا..
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يرونه مهرّجاً يحرك المشاعرا..
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يَرَوْنَ قرصاناً به
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يقتنصُ الكنوزَ.. والنساءَ.. والحرائرا
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يرون فيه ساحرا..
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يحوّل النحاسَ في دقيقةٍ
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إلى ذهبْْ..
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ما أصعبَ الأدبْ!
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فالشعرُ لا يُقرأ في بلادنا لذاتهِ..
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لجرْسِهِ..
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أو عمقهِ..
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أو محتوى لَفْظاتِهِ..
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فكلُّ ما يهمنّا..
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من شعرِ هذا الشاعرِ..
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ما عَدَدُ النساءِ في حياتهِ؟
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وهل لهُ صديقةٌ جديدَهْ؟
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فالناسُ..
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يقرأون في بلادنا القصيدَهْ..
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ويذبحونَ صاحبَ القصيدَه..
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أعطيتُ هذا الشرقَ من قصائدي بيادرا
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علّقتُ في سمائه.. النجومَ والجواهرا
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ملأتُ يا حبيبتي..
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بحبّه الدفاترا..
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ورغم ما كتبتُهُ..
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ورغم ما نشرتُهُ
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ترفضني المدينةُ الكئيبَهْ..
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تلك التي سماؤها لا تعرف المطَرْ..
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وخبزُها اليوميُّ.. حقدٌ وضجَرْ..
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ترفضني المدينةُ الرهيبَهْ..
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لأنني .. بالشِعْر يا حبيبَهْ
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غيّرتُ تاريخَ القَمَرْ..
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