| ذات يوم ستذكرين ارتجافي | بين كفسك وانهيال اعترافي |
| وسؤالي من ذا هنا وارتياعي | من سؤالي وخشيتي ان تخافي |
| واقترابي حتى شمعت وعودي | بأسى جبئتي وهزء انصرافي |
| وورائي ذكرى تعض يديها | وامامي طيف كوحش خرافي |
| من رآني من أين جئت وأمضى | كالصدا كاغتراب ريح الفيافي |
| أي جذلى رجعت عنها ومنها | واليها جنازتي وزفافي |
| والذي كان منزلي قبل حين | جثته فاستحال منفى المنافي |
***
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| انما سوف تذكرين وقوفي | بين كفيك أجتدي أو أصافي |
| ذات يوم سترحمين احترافي | بعدما ذبت واعتصرت جفافي |
| وتقولين كان عصفور حب | ظامئا كيف عز عنه ارتشافي |
| كان يأتي والجوع يشوي يديه | وعلى وجهه اصفرار القوافي |
| واختلاجاته تسلّي غروري | وانكساراته تحت انعطافي |
| كان يقتاده عبيري فيدنو | ثم يثنيه ضعفه عن قطافي |
***
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| وتعودين تذكرين التماسي | ورجوعي وكيف كنت أوافي |
| وتودين لو بذلت ولكن | عند ان تجدبي وارضى عفافي |
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